सोमवार, 7 मई 2012

Kahani me sach hai ya sach hi kahani hai ???

Har kahi jane wali baat kab kahani ban jati hai kisi ko pata bhi nahi chalta aur har suni jane wali baat sach ho to
fir kahani ka maza nahi rah jata. Aise hi  kuch katthe mithe kaha-suni se jeevan ki kahani banati hai . Is kahani ke patra bhi hum hi hain aur kathakar bhi hum khud hain, sare charitra hamare apne khud ke gadhe hue hain, in sare patron me humara sach kya hai? Ise agar humne pehchan liya to hum, jeevan ki is kahani ko samajh jayenge.

1 टिप्पणी:

  1. "हर कही जाने वाली बात कब कहानी बन जाती है किसी को पता भी नहीं चलता और हर सुनी जाने वाली बात सच हो तो
    फिर कहानी का मज़ा नहीं रह जाता . ऐसे ही कुछ खट्ठे- मीठे कहा -सुनी से जीवन की कहानी बनती है . इस कहानी के पात्र भी हम ही हैं और कथाकार भी हम खुद हैं , सारे चरित्र हमारे अपने खुद के गढ़े हुए हैं , इन सारे पात्रों में हमारा सच क्या है ? इसे अगर हमने पहचान लिया तो हम , जीवन की इस कहानी को समझ जायेंगे ..............."
    निसंदेह सुंदर पंक्तियाँ .....
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    पी.एस. भाकुनी
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