Friday, November 20, 2009

खाली हाथ नहीं लौटा किसान

अम्बरीश कुमार
लखनऊ नवम्बर। उत्तर प्रदेश से ट्रेक्टर ,ट्राली और बसों से दिल्ली में अपनी आवाज उठाने गया किसान इस बार खाली हाथ नहीं लौटा ,जिसकी उसने कसम खाई थी । किसानो के सवाल पर देश की सबसे बड़ी पंचायत भी नहीं चली और सरकार को झुकना पड़ा।गन्ना किसानो ने कल घेरा डाला तो सरकार ने गन्ना अध्यादेश में बदलाव का एलान किया तो आज भूमि अधिग्रहण कानून १८९४ को बदलने के लिए किसानो की पंचायत में प्रधानमंत्री ने अपना दूत भेजा और भरोसा दिया । किसान मंच के नेता विनोद सिंह ने कहा -हम ने कहा था की खाली हाथ नहीं लौटेंगे और सरकार के भरोसा देने के बाद लोटे है ।प्रधानमन्त्री के दूत के रूप में कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने हमारी पंचायत में आकर भरोसा दिया है।
उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ महीनो से किसान लामबंद हो रहा था ।मुद्दे एक नहीं कई थे ।भूमि अधिग्रहण का अंग्रेजो का बनाया १८९४ का कानून बदलने से लेकर गंगा और यमुना एक्सप्रेस वे का मुद्दा तो था ही हाल ही में गन्ना किसान भी उठ खड़े हुए । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानो का सबसे बड़ा सहारा हैं ।किसानो की अर्थव्यवस्था इसी गन्ने पर निर्भर है ,लड़के लड़की की शादी से लेकर खेत मकान आदि इसी के पैसे से बनते है ।ऐसे में केंद्र सरकार का गन्ना अध्यादेश किसानो को बर्बाद करने वाला साबित होता।इसके लिए अजित सिंह ने पहल की और मुलायम सिंह के साथ वामपंथी पार्टियों को भी जोड़ा।जिसके बाद किसानो का दिल्ली मार्च हुआ और संसद से सड़क तक रुक गई।नतीजतन केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और वह गन्ना अध्यादेश अब इतिहास बन गया जिसके नाम पर किसानो को चीनी मिल मालिको के आगे घुटने टेकने के लिए मजबूर किया जा रहा था ।
संसद का पहला दिन गन्ना किसानो के नाम रहा।दुसरे दिन उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा ,पंजाब ,मध्यप्रदेश ,राजस्थान और महारास्त्र तक के किसान अपनी जमीन बचाने के लिए जुटे।किसानो की इस पंचायत में वामपंथी नेताओ से लेकर कई किसान नेता बोले।किसान नेता प्रताप गोस्वामी ने कहा -हमारा किसान मार्च कामयाब रहा।प्रधानमंत्री की तरफ से दिग्विजय सिंह ने कहा है की भूमि अधिग्रहण कानून बदला जायेगा ,दिक्कत यह है की ममता बनर्जी अभी राजी नहीं है।कांग्रेस के नेता प्रणव मुखर्जी उनसे बात करेंगे । हालाँकि दिग्विजय ने यह भी कहा की जब तक इस कानून में बदलाव नहीं हो जाता किसानो की जमीन इसी कानून के जरिये ली जाएगी ।
फिर भी किसानो की एकजुटता ने नया सन्देश दिया है।अलग अलग मुद्दों पर किसानो के भिन्न संगठनो का ध्रुवीकरण हुआ।एक तरफ महेंद्र सिंह टिकैत चौधरी अजित सिंह और मुलायम सिंह के साथ खड़े थे तो दूसरी तरफ वीपी सिंह के किसान मंच के साथ किसान नेता ऋषिपाल अम्बावत से लेकर वासुदेव आचार्य और भीम सिंह । एक मोर्चा गन्ना किसान का था तो दूसरा किसानो की जमीन बचाने का ।किसानो के दोनों मोर्चो पर कामयाबी हासिल हुई है जिसके नतीजे दूरगामी होँगे ।छोटी पंचायत से लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत तक गए किसान इस बार खली हाथ नहीं लौटे ।
जनसत्ता

Thursday, November 19, 2009

हम एक लड़ाई लड़ रहे हैं-किशनजी

अगर सरकार सुरक्षा बलों को वापस बुला लेती है तो हम बात करने के लिए तैयार हैं। हिंसा हमारे एजेंडे में नहीं है. हम सिर्फ जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं. पिछले महीने बस्तर में कोबरा फोर्स ने 12 माओवादियों के साथ 18 निर्दोष ग्रामीणों को मार दिया. छत्तीसगढ़ में उन लोगों को गिरफ्तार कर लिया जो विकास कार्यों के जरिए हमारी मदद कर रहे थे. हाल ही में छत्तीसगढ़ के डीजीपी ने सलवा जुडूम के 6000 विशेष पुलिस अधिकारियों को गौरव का प्रतीक बताया.

सीपीआई (माओवादी) पोलित ब्यूरो किशनजी का साक्षात्कार
मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी बिना झिझक, गर्व के साथ खुद को देश का दूसरा सर्वाधिक वांछित व्यक्ति बताते हैं। सीपीआई (माओवादी) की पोलित ब्यूरो के इस 53 वर्षीय सदस्य की तुषा मित्तल के साथ फोन पर हुई बातचीत के मुख्य अंश:
सबसे पहले अपनी निजी जिंदगी के बारे में कुछ बताइए. सीपीआई (माओवादी) से जुड़ने का ख्याल कैसे आया?
मैं करीमनगर के पेड्डापल्ली गांव में पैदा हुआ. मेरा जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, पर हमारे परिवार ने कभी जाति को तवज्जो नहीं दी. मेरे पिता आंध्र प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष थे. मैंने गणित में बीएससी की और उसके बाद 1983 में लॉ की पढ़ाई के लिए हैदराबाद आ गया. यहां मैं तेलंगाना संघर्ष समिति से जुड़ गया. बाद में यहीं रैडिकल स्टूडेंट्स यूनियन की नींव रखी. इसके पहले इमरजेंसी में मैंने भूमिगत रहते हुए इसके खिलाफ अभियान चलाया था. मेरे ऊपर कई चीजों का प्रभाव रहा: लेखक वारवरा राव, देश की राजनीतिक दशा और जिस तरह के प्रगतिशील माहौल में पला-बढ़ा. मेरे पिता एक स्वतंत्रता सेनानी और लोकतंत्र में अगाध श्रद्धा रखने वाले व्यक्ति थे. जब मैंने सीपीआई (एमएल) की सदस्यता ग्रहण की तो मेरे पिताजी ने यह कहते हुए कांग्रेस की सदस्यता छोड़ दी कि एक छत के नीचे दो तरह की राजनीति नहीं चल सकती. 1977 में आपातकाल खत्म होने के बाद मैंने एक देशव्यापी आंदोलन की अगुवाई की जिसमें देश भर से करीब 60,000 किसानों ने हिस्सा लिया था.
किसी भी राजनीतिक पार्टी का नेता अपने अध्यक्ष के खिलाफ आवाज उठा सकता है? औपचारिक और वास्तविक लोकतंत्र के बीच गहरी खाई है
गृहमंत्री अब सीपीआई (माओवादी) से कई मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार हो गए हैं. आप उनका प्रस्ताव क्यों ठुकरा रहे हैं? वे आपसे सिर्फ हिंसा न करने के लिए ही तो कह रहे हैं.
अगर सरकार सुरक्षा बलों को वापस बुला लेती है तो हम बात करने के लिए तैयार हैं। हिंसा हमारे एजेंडे में नहीं है. हम सिर्फ जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं. पिछले महीने बस्तर में कोबरा फोर्स ने 12 माओवादियों के साथ 18 निर्दोष ग्रामीणों को मार दिया. छत्तीसगढ़ में उन लोगों को गिरफ्तार कर लिया जो विकास कार्यों के जरिए हमारी मदद कर रहे थे. हाल ही में छत्तीसगढ़ के डीजीपी ने सलवा जुडूम के 6000 विशेष पुलिस अधिकारियों को गौरव का प्रतीक बताया. नई भर्तियां चालू हैं. ये लोग सालों से हत्या, बलात्कार और लूटपाट करते आ रहे हैं. हम सरकार के वादे पर भरोसा नहीं कर सकते. वह अपनी नीतियों को कैसे बदलेगी जब उसके हाथ में ही कुछ नहीं है? यह तो विश्व बैंक और अमेरिका के हाथों में है.
हिंसा रोकने के लिए आपकी क्या शर्तें होंगी?
प्रधानमंत्री वनवासियों से माफी मांगें, सुरक्षा बलों को हटाएं, जेल में बंद कैदियों को रिहा किया जाय। सुरक्षा बलों को हटाने के लिए जरूरी समय लीजिए लेकिन यह सुनिश्चित कीजिए कि पुलिस अब कोई हमला नहीं करेगी. अगर सरकार इसपर राजी है तो हम हिंसा रोक देंगे. हम पहले की तरह गांवों में अपना आंदोलन चलाएंगे.
क्या आप भी यह वादा कर सकते हैं कि एक महीने तक कोई हमला नहीं करेंगे?
हम विचार करेंगे। मुझे अपने महासचिव से बात करनी होगी. पर इस बात की क्या गारंटी है कि अगले एक महीने पुलिस भी हमला नहीं करेगी? पहले सरकार को इसकी घोषणा करने और सुरक्षा बलों को हटाने दीजिए, सिर्फ दिखाने से भी काम नहीं चलेगा. आंध्र प्रदेश में क्या हुआ, हमारी केंद्रीय समिति के सदस्य राज्य के मुख्य सचिव से बात करने गए थे. उन्हें गोली मार दी गई.
अगर आप जनहित की बात करते हैं तो हथियार क्यों उठा रखे हैं? आपका लक्ष्य आदिवासी हित है या राजनीतिक ताकत?
राजनीतिक ताकत. आदिवासी हित हमारा लक्ष्य है पर राजनीतिक ताकत के बिना यह संभव नहीं. हथियार के बिना सत्ता नहीं मिलती. आदिवासियों का शोषण इसीलिए हुआ क्योंकि उनके पास राजनीतिक ताकत नहीं थी. अपनी ही संपदा पर उनका अधिकार जाता रहा. पर हथियार हमारी विचारधारा नहीं है. हम उसे दूसरे स्थान पर रखते हैं. इसकी वजह से हम आंध्र प्रदेश में नुकसान भी उठा चुके हैं।
सरकार कह रही है पहले हिंसा रोको. आप कह रहे हैं पहले पुलिस हटाओ. इन सबके बीच पिस रहा है वह वनवासी जिसके हित का आप दावा कर रहे हैं.
हमने वाममोर्चे के घटक दलों- फारवर्ड ब्लॉक, आरएसपी, सीपीआई- के दरवाजे खड़काए हैं. मैं तो बंगाल सरकार के कई मंत्रियों तक के संपर्क में हूं. मैंने मुख्यमंत्री से भी बात की है
तो फिर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों को बुला लीजिए। हमने कहीं हिंसा नहीं शुरू की. आंध्र प्रदेश हो या पश्चिम बंगाल या उड़ीसा, हमने कहीं हिंसा शुरू नहीं की. बंगाल में सीपीएम ने सबको गांवों में घुसने से रोक दिया था. जब बंगाल में न्यूनतम मजदूरी 85 रूपए थी तब उन्हें 22 रुपए दिए जा रहे थे. हम सिर्फ 25 रुपए मांग रहे थे. कौरवों ने पांडवों को पांच गांव भी देने से इनकार कर दिया था इसीलिए महाभारत हुआ. हम पांडव हैं और वे कौरव हैं.
आप अहिंसक होने की बात कर रहे हैं और आपके अभियानों में पिछले चार साल के दौरान 900 से ज्यादा पुलिस वाले मारे जा चुके हैं. इनमें से कई गरीब आदीवासी भी हैं. यह कैसा जनहित है?
हमारी लड़ाई व्यवस्था से है। हम पुलिस वालों की हत्याएं कम करना चाहते हैं. पिछले 28 सालों के सीपीएमराज में 51,000 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है. हां पिछले सात महीनों में हमने भी सीपीएम के 52 लोगों को मारा है लेकिन यह सिर्फ बदले की कार्रवाई है.
सीपीआई (माओवादी) को धन कहां से मिलता है? आपपर जबरन वसूली के आरोप भी लगते हैं?
कोई जबरन वसूली नहीं होती। हम बड़े औद्योगिक घरानों और बुर्जुआओं से कर लेते हैं लेकिन यह राजनीतिक पार्टियों द्वारा वसूले जाने वाले चंदे के जैसा ही है. ग्रामीण भी साल में दो दिन की अपनी कमाई स्वेच्छा से हमें दान देते हैं. इस साल गढ़चिरौली में बांस की कटाई के दो दिनों से हमें 25 लाख रुपए मिले. बस्तर में तेंदू पत्तों से 35 लाख. बाकी जगहों पर किसानों ने हमें करीब 1000 कुंतल के करीब धान का दान दिया. एक-एक पैसे का हर छह महीने में ऑडिट होता है.
किसानों ने कभी इनकार किया?
नहीं। वे हमारे साथ हैं. हम ग्रामीणों के विकास के लिए जो करते हैं उसके एवज में एक पैसा भी नहीं लेते.
आपने किस तरह के विकास कार्य किए हैं? इससे आदिवासियों के जीवन में क्या सुधार आया है?
हम उन्हें राज्य और अमीरों का असली चेहरा दिखाते हैं। वे पहले एक रुपए में 1000 तेंदू पत्ते बेचते थे हमने इन्हें कई जगह 50 पैसा प्रति पत्ता करवा दिया है. कागज मिलों में 50 पैसा प्रति बंडल के हिसाब से बांस बिकता था हमने इसे 55 रुपए प्रति बंडल करवाया. सीपीआई (माओवादी) हर दिन देश के 1,200 गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करवाती है. अकेले बस्तर जिले में इस तरह के करीब 50 मोबाइल स्वास्थ्य दल और 100 के लगभग मोबाइल अस्पताल हैं. हम लोगों को मुफ्त दवाएं मुहैया कराते हैं. सरकार को तो पता भी नहीं कि ये दवाएं उसी की हैं.
अगर नक्सली इलाकों में सरकार अपना दल भेजती है तो आप आने देंगे?
हम इसका स्वागत करेंगे। छात्र और डॉक्टर यहां आ सकते हैं. लालगढ़ के लोग एक दशक से अस्पताल की मांग कर रहे थे, पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया. जब लोगों ने अपने पैसे से अस्पताल बना लिया तो सरकार ने उसे सेना की छावनी बना दिया.
आपकी दीर्घकालिक योजनाएं क्या हैं? तीन मुख्य लक्ष्य बताइए.
राजनीतिक ताकत हासिल करके एक नया लोकतंत्र फिर समाजवाद और साम्यवाद स्थापित करना। दूसरा, अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना ताकि हमें साम्राज्यवादियों से कर्ज लेने की जरूरत न पड़े. हम आज भी दशकों पुराने कर्ज चुका रहे हैं. हमें ऐसी अर्थव्यवस्था की जरूरत है जो कृषि और उद्योग पर आधारित हो. आदिवासियों का उनकी जमीन पर अधिकार होना चाहिए. हम उद्योगों के विरोधी नहीं हैं, आखिर इसके बिना विकास कैसे होगा? पर हमें सोचना होगा कि भारत के लिए क्या ठीक रहेगा. बड़े-बड़े बांधों और उद्योगों की बजाय हमें छोटे-छोटे उद्योग लगाने होंगे. तीसरा लक्ष्य है देश में मौजूद तमाम बड़े औद्योगिक समूहों- टाटा से लेकर अंबानी तक- की संपत्ति जब्त करके उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करना और उनके मालिकों को जेल में डालना.
लेकिन दुनिया भर में कम्युनिस्ट सरकारों का इतिहास देखें तो वे दमन का ही प्रतीक दिखती हैं. माओवादी राज्य-व्यवस्थाओं में असहमति की कोई जगह नहीं होती. ये जनता के हित में कैसे हैं?
ये कहानियां पूंजीवादियों की फैलाई हैं। गांवो में सैकड़ों लोग मर रहे हैं, लेकिन डॉक्टर शहरों में रहना चाहते हैं, इंजीनियर जापान में काम करना चाहते हैं. वे देश के संसाधनों से वहां तक पहुंचे हैं मगर देश के लिए क्या कर रहे हैं? राज्य आपको डॉक्टर बनने के लिए मजबूर नहीं करता लेकिन अगर आप बनते हैं तो आपको दो साल गांवों में काम करने के लिए मजबूर करने में कोई बुराई नहीं है. कोई राज्य कितना दमनकारी है यह इसपर निर्भर करता है कि सत्ता की कुंजी किसके पास है. हम लोकतांत्रिक संस्कृति चाहते हैं. अगर हम ऐसा नहीं करते तो ग्रामीण एक और क्रांति करके हमें उखाड़ फेंकें. बस्तर जिले में एक वैकल्पिक लोकतांत्रिक सरकार शैशवावस्था में है. चुनावों के जरिए हम स्थानीय सरकार बनाते हैं जिसे रिवॉल्यूशनरी पीपुल्स गवर्नमेंट कहा जाता है. इसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और कानून व्यवस्था से जुड़े पदाधिकारी होते हैं. यह व्यवस्था देश के 40 जिलों में काम कर रही है. यह धारणा बिल्कुल गलत है कि हम लोकतंत्र में विश्वास नहीं करते. भारत में इस समय सिर्फ औपचारिक लोकतंत्र है. किसी भी राजनीतिक पार्टी का नेता अपने अध्यक्ष के खिलाफ आवाज उठा सकता है? औपचारिक और वास्तविक लोकतंत्र के बीच गहरी खाई है.
अगर आप लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं तो फिर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का बहिष्कार क्यों करते हैं? नेपाल में तो माओवादियों ने चुनाव लड़ा
नया लोकतंत्र स्थापित करने के लिए पुराने को खत्म करना जरूरी है। नेपाल में माओवादियों ने राजनीतिक पार्टियों से समझौता कर लिया. आप किस लोकतंत्र की बात कर रही हैं. 180 सांसदों पर आपराधिक आरोप हैं, 310 सांसद करोड़पति हैं. आपको पता है अमेरिकी सेना ने उत्तर प्रदेश में एक छावनी में अभ्यास शुरू कर दिया है? वे खुलेआम कहते हैं हम जहां चाहे भारतीय सेना को ले जा सकते हैं. उन्हें ऐसा करने की छूट कौन दे रहा है? मैं तो नहीं दे रहा. मैं सच्चा देशभक्त हूं.
आप भारत को कैसा देखना चाहते हैं? कोई एक देश बताइए.
हमारा पहला रोल मॉडल था पेरिस। उसका विघटन हो गया. रूस भी ध्वस्त हो गया. इसके बाद चीन का उदय हुआ, लेकिन माओ के बाद वह भी भटक गया है. फिलहाल पूरी दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है जहां असली ताकत जनता के पास हो. हर जगह मजदूर अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. फिलहाल तो कोई भी रोलमॉडल नहीं है.
जब साम्यवाद दुनिया-भर में कहीं नहीं चला तो फिर भारत में यह कैसे सफल होगा?
चीन भी यह मानता है कि माओ के सिद्धांत में त्रुटियां थीं। नेपाल में माओवादी विदेशी निवेश स्वीकार कर रहे हैं. नेपाली माओवादी गलत रास्ते पर जा रहे हैं, वे एक और बुद्धदेब बाबू बनने की राह पर हैं. जहां भी साम्यवाद ने पैर जमाया है पूंजीवाद ने उसे उखाड़ने की कोशिश की है. लेनिन, माओ, प्रचंड सबकी कुछ कमजोरियां हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लेनिन और स्तालिन ने आंतरिक लोकतंत्र को खत्म करके नौकरशाही को बढ़ावा दिया. उन्होंने जनता की हिस्सेदारी को नकारा. हमने उन गलतियों से सीख ली है. लेकिन पूंजीवाद को भी मुंह की खानी पड़ी है. आप कह सकती हैं कि पूंजीवाद सफल रहा है? साम्यवाद ही एकमात्र रास्ता है.
सत्ता में आने के बाद आप भी नेपाली माओवादियों या सीपीएम की तरह असफल साबित हो सकते हैं?
मैं लोगों से अपील करता हूं कि यदि हम बदल जाते हैं तो हमारे खिलाफ भी क्रांति करें। अगर शासक शोषक बन जाए तो जनता का अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए उठ खड़ा होना जरूरी होता है. उन्हें किसी के ऊपर अंध श्रद्धा रखने की जरूरत नहीं है.
क्या आप कभी द्वंद्व से गुजरे हैं? क्या राज्य पर दबाव बनाने के लिए हिंसा ही एकमात्र रास्ता है?
मुझे विश्वास है कि हम सही काम कर रहे हैं. हम एक लड़ाई लड़ रहे हैं. इस दौरान हमसे गलतियां भी हो सकती हैं. लेकिन राज्य के उलट हम इसे स्वीकार करते हैं. फ्रांसिस इंदूवर का सर काटना गलती थी. हम इसके लिए माफी मांगते हैं. लालगढ़ में हम अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं. हमने सरकार से पूर्ण विकास की मांग की है और उन्हें 27 नवंबर की समय सीमा दी है. हमने उनसे 300 बोरवेल और 50 अस्थायी अस्पताल की मांग की है. अगर सरकार ने इन्हें पूरा कर दिया तब हम उनसे कुछ और मांग करेंगे. हमने वाममोर्चे के घटक दलों- फारवर्ड ब्लॉक, आरएसपी, सीपीआई- के दरवाजे खड़काए हैं. मैं तो बंगाल सरकार के कई मंत्रियों तक के संपर्क में हूं. मैंने मुख्यमंत्री से भी बात की है.
मुख्यमंत्री कार्यालय ने इसका खंडन किया है.
मैंने मुख्यमंत्री से बात की है मैंने उनसे सरकारी दमन रोकने को कहा। उन्होंने कहा कि उनके ऊपर अपनी पार्टी और गृहमंत्री पी चिदंबरम का दबाव है.
पुलिस आप तक क्यों नहीं पहुंच पा रही है?
मैं देश में दूसरा सर्वाधिक वांछित व्यक्ति हूं। आठ राज्यों में दिन-रात मेरी तलाश हो रही है. आज कल बंगाल के 1600 गांवों में लोग रात को जागकर पहरा देते हैं ताकि पुलिस मुझे पकड़ नहीं सके. जहां मैं इस समय हूं वहां से डेढ़ किलोमीटर दूर पुलिस की छावनी है जहां 500 पुलिस वाले रह रहे हैं. बंगाल के लोग मुझे प्यार करते हैं. मुझे पकड़ने से पहले उन्हें उनको मारना होगा.
गृहसचिव ने आरोप लगाया कि चीन आप लोगों को हथियार पहुंचा रहा है. यह बात सच है?
जीके पिल्लई को हमारे मूल दर्शन की जानकारी ही नहीं है। युद्ध जीतने के लिए अपने शत्रु की पूरी जानकारी होना बहुत जरूरी है. हमारी स्थिति चीन से बिल्कुल भिन्न है. मैंने सोचा था कि चिदंबरम और पिल्लई मुझे कड़ी टक्कर देंगे, मगर यह नहीं पता था कि वे किसी लायक नहीं निकलेंगे. वे हवा में तलवारें भांज रहे हैं. जीत हमारी ही होगी.
लश्कर-ए-तैयबा के बारे में क्या सोचते हैं? आप उनकी लड़ाई का समर्थन करते हैं?
हम उनकी कुछ माँगों का समर्थन करते हैं लेकिन उनके तरीके गलत और जनविरोधी हैं। उन्हें अपनी आतंकी गतिविधियों को रोकना चाहिए क्योंकि इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। आप सिर्फ जनता का दिल जीतकर ही सफल हो सकते हैं।
तहलका से साभार



गावं में मौत, शहर में महोत्सव

अंबरीश कुमार
सोनभद्र/लखनऊ, नवंबर। रिहंद बांध के जहरीले पानी से पिछले दो हफ्ते में दो दजर्न से ज्यादा लोगों की मौत के बाद अब सोनभद्र में आंदोलन शुरू हो गया है। कल यानी रविवार को दो बच्चों की मौत हो गई। रिहंद बांध के पानी में पहले जहां बिजली घरों का फ्लाई ऐश बहाया जता था, वहीं अब कनौड़िया केमिकल्स का जहरीला कचरा बहाया ज रहा है। रविवार को रिहंद बांध से लगे लभरी गांव में इसी जहरीले पानी के चलते तेरह साल की सुनीता ने दम तोड़ दिया। गांव वाले बेहाल थे तो दूसरी तरफ समूचा प्रशासन सोन महोत्सव में जश्न मना रहा था। और तो और कलेक्टर पंधारी यादव के पास इतनी फुरसत नहीं थी कि वे जश्न छोड़ जहरीले पानी से दम तोड़ रहे बच्चों के परिवार वालों से मिल पाते। जन संघर्ष मोर्चा ने आज इस मुद्दे पर प्रदर्शन कर धरना दिया पर कलेक्टर को ज्ञापन इसलिए नहीं मिल पाया क्योंकि वे सोन महोत्सव में व्यस्त थे।
पिछले दो हफ्ते में जो लोग रिहंद बांध के जहरीले पानी से मरे हैं, उनका ब्योरा जन संघर्ष मोर्चा ने तैयार किया है। खास बात यह है कि जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी जीके कुरील भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि बांध का पानी गांव वाले न पिएं। यह पानी जहरीला हो चुका है। रविवार को लभरी गांव में सुनीता की मौत के बाद जब जीके कुरील से फोन पर इस संवाददाता ने संपर्क करने की कोशिश की तो उन्होंने भी फोन काट दिया। बाद में कलेक्टर पंधारी यादव को फोन किया गया तो उन्होंने भी फोन काट दिया। जिले के वरिष्ठ पत्रकार सुल्तान शहरयार खान ने कहा, ‘इस समय कोई भी अफसर फोन नहीं उठाएगा। ये सब लोग सोन महोत्सव के नाच-गाने में व्यस्त हैं। वैसे भी रिहंद बांध के जहरीले पानी को लेकर कई बार आवाज उठाई गई पर प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। यही वजह है कि इस पानी को पीकर अब लोगों की जान ज रही है। कनौड़िया केमिकल्स का कचरा लोगों की जान ले रहा है।’
जन संघर्ष मोर्चा के प्रतिनिधिमंडल ने रिहंद बांध से जुड़े कमारी डाह और लभरी गांव में जहरीले पानी के चलते पिछले दो हफ्ते में मरने वालों की सूची जरी की है। कमारी डाह में हाल ही में जिन लोगों की मौत हुई है, उनमें छह साल की चुनमुअर, एक साल की रीना, पांच साल की रीता, तीन साल का वीरभान, आठ साल की गीता, छह साल की पूनम, दो साल की सुनैयना, ५३ साल की सुगुनी और ६३ साल के राम दुलार शामिल हैं। दूसरी तरफ लभरी गांव में जिन लोगों की मृत्यु हुई है, उनमें दो साल की ऊषा, चार साल का राम बाबू, पांच साल की सरिता, चार साल की सोनू, तीन साल का राकेश, तेरह साल की सुनीता, ४८ साल का राम चंदर और ४0 साल का गणोश यादव शामिल है। इतने लोगों की मौत के बाद भी जिला प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। रविवार को लभरी गांव में एक बच्ची की मौत के बाद जन संघर्ष मोर्चा के दिनकर कपूर ने गांव में जकर उसके परिजनों से बात की और फिर कलेक्टर पंधारी यादव को इस हादसे की जनकारी दी। पंधारी यादव ने बताया कि बांध का पानी जाच के लिए रूड़की स्थित प्रयोगशाला को भेज गया है।
रिहंद बांध का पानी पहले से ही काफी प्रदूषित है। पिछली बार इस संवाददाता ने रेणुकूट में देखा कि वहां हैदराबाद से लाई मछलियां बिक रही हैं। पता चला कि रिहंद बांध के पानी में मछली जिंदा नहीं रह पाती। अगर बांध के पानी में कहीं से मछली मिल भी जए तो उसको खाने वाला जिंदा नहीं बचता। बांध के पानी में अनपरा पावर हाउस, एनटीपीसी की रेणू सागर इकाई और हिन्डालको के बिजली घर का फ्लाई ऐश इस पानी में बहाया जता रहा है। बांध में हिंडालकों और एनटीपीसी ने अपने कचरे को शोधित करने की व्यवस्था की। तो दूसरी तरफ कनौड़िया केमिकल्स ने अपना जहरीला कचरा रिहंद बांध के पानी में डालना शुरू कर दिया। जिसके चलते बांध के आसपास के गांव में लोग बीमार पड़ने लगे। रिहंद बांध के आसपास के दजर्न भर गांवों में प्रदूषित पानी के चलते लोग बीमार पड़ चुके हैं। जिन गांवों में प्रदूषित पानी का ज्यादा असर पड़ा है, उनमें दुमरचुआं, महरी कला, बहेड़ा कला और पखतवा गांव शामिल हैं। प्रशासन कहता है कि वे बांध का पानी न पिएं। लभरी गांव के राम प्रसाद ने कहा-कहां का पानी पिएं। हैंडपंप का पानी मिलता नहीं। जिंदा रहने के लिए मजबूरी में यह पानी पीते हैं और बीमार पड़ते हैं। सोनभद्र की सामाजिक कार्यकर्ता रोमा ने कहा-हम लोग ने रिहंद बांध के पानी की गुणवत्ता का अध्ययन कराया और पता चला कि यह पानी किसी भी हाल में पीने लायक नहीं है। बावजूद इसके पीने के पानी का वैकल्पिक इंतजम नहीं किया जा रहा है।
जन संघर्ष मोर्चा ने आज राबर्टसगंज में धरना देकर कनौड़िया केमिकल्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। इसके साथ ही जहरीला पानी पीकर मरने वालों के परिजनों को मुआवज देने और प्रभावित गांवों में तत्काल प्रभाव से हैंडपंप लगाने की मांग की। दिनकर कपूर ने कहा-अगर यह मांगें प्रशासन ने नहीं मानी तो आंदोलन सोनभद्र से लेकर दिल्ली तक चलेगा।

Tuesday, November 17, 2009

लोहिया के बाद हिंदी के नए झंडाबरदार अबू आज़मी


सविता वर्मा
लखनऊ, नवंबर। अबू आज़मी समाजवादी पार्टी का नया मुस्लिम चेहरा बन गए है । आजम खान की बगावत के कई महीने बाद मुंबई के इस भाई को पार्टी ने तब आगे किया जब वे हिंदी के नए हीरो बन गए । मंगलवार को लखनऊ में अबू आज़मी का जिस अंदाज़ में स्वागत हुआ वह हैरान करने वाला था। मुलायम से लेकर अमर सिंह तक नतमस्तक थे । अमर सिंह ने कहा --जिस आदमी को लोग डान का आदमी कहते हैं, वह हिन्दी का आदमी है। वह मुंबई में उत्तर भारत के गरीब मुसलमानों, खोंमचे वालों के सम्मान के विश्वास के प्रतीक हैं।
समाजवादी आन्दोलन में कभी राम मनोहर लोहिया हिंदी का सवाल उठाते थे तो आज डान का भाई अबू आजमी हिंदी के नए झंडाबरदार के रूप में उभर रहा है । अबू आजमी ने लखनऊ से राज ठाकरे को चेतावनी देते हुए कहा की वह महांराष्ट्र विधान सभा में हिंदी लाकर रहेगा ठाकरे में हिम्मत है तो रोक कर देखे । समाजवादी पार्टी छह दिसम्बर से मुसलिम समुदाय के बीच अभियान छेड़ेगी और इसका नेतृत्व
अबू आजमी करेंगे । जो यह सवाल उठाएंगे कि मुसलमानों का असली हितैषी कौन है, बसपा, कांग्रेस या सपा। आजमी ने अपने सम्मान समारोह में बाबरी मसजिद ध्वंस का सवाल उठाते हुए कहा कि पहले उसी स्थान पर मसजिद का पुनर्निर्माण किया जए जहां वह गिराई गई थी, उसके बाद मुकदमा चले। इस मौके पर अबू आजमी ने कहा, ‘अबू आजमी मारा जा सकता है लेकिन आपको नाउम्मीद नहीं करेगा।’ उत्तर प्रदेश के उप चुनाव में करारी हार के बाद मुलायम सिंह यादव ने फ़ौरन कल्याण सिंह को किनारे लगाते हुए फिर मुसलमानों को करीब लाने की कवायद शुरू कर दी है । यह बात अलग है की मुसलमान मुंबई के इस भाई को आजम खान के विकल्प के रूप में स्वीकार करता है या नहीं ।
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Monday, November 16, 2009

बाल ठाकरे की पाती सचिन के नाम

चिरंजीव सचिन को,
खेल के मैदान में तू बादशाह जैसा खेला। तुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोहरत मिली। भरपूर पैसे भी मिले। तेरे लखपति नहीं, करोड़पति नहीं बल्कि अरबपति होने पर भी किसी को कोई आपत्ति नहीं है। उल्टा अभिमान महसूस होता है। खेल के मैदान में तू एक तेज की तरह चमक रहा है। लेकिन प्रेस वार्ता में तूने कहा, ‘मुझे मराठी और महाराष्ट्र का होने पर गर्व है, लेकिन मैं सबसे पहले हिंदुस्तानी हूं।’ तेरे इस स्ट्रेट ड्राइव जैसे बयान से मराठी मन को दुख पहुंचा है। क्योंकि तू अपने खेल मैदान को छोड़कर राजनीति के मैदान में कूदा और बोला, ‘यह मुंबई किसी की जागीर नहीं है। हिंदुस्तान के सभी लोगों का मुंबई पर बराबर का अधिकार है।’


Sunday, November 15, 2009

प्रभाष जी ऐसे द्रोणाचार्य थे, जो हमेशा पांडवों की तरफ से लड़े

इसमें वे भी थे जो हाल में ब्लागों पर प्रभाष जी को ब्राह्मणवादी बता कर उनकी आलोचना कर रहे थे और वे भी थे जो बहुत चाह कर जनसत्ताई नहीं बन पाए थे। प्रभाष जी ऐसे द्रोणाचार्य थे, जो हमेशा पांडवों की तरफ से लड़े। उनके अर्जुन और भीम जैसे शिष्य भले हों, पर उनके एकलव्यों की बहुत बड़ी संख्या है। जिनसे उन्होंने कभी अंगूठा नहीं मांगा। इसीलिए वे आज अर्जुन से बड़े धनुर्धर हैं।

प्रभाष जी ऐसे द्रोणाचार्य थे, जो हमेशा पांडवों की तरफ से लड़े

अरुण कुमार त्रिपाठी

अक्टूबर के आखिरी हफ्ते का कोई दिन रहा होगा। मैं तेजी से हिंदुस्तान टाइम्स बिल्डिंग की सीढ़ियों की तरफ बढ़ा जा रहा था। संपादकीय मीटिंग का समय होने वाला था। अचानक मुझे लगा कि कोई बड़ी छाया मेरा रास्ता रोक रही है। मैं जब तक अपना बाइफोकल सेट कर उसकी तरफ देखूं तब तक उसके दोनों हाथ मेरे कंधों पर पड़ चुके थे। ‘और पंडित बहुत तेजी में हो।’ देखा सिल्क का लंबा कुर्ता और धोती पहने प्रभाष जी (जोशी) सामने खड़े हैं। एचटी बिल्डिंग में उन्हें देख कर सुखद आश्चर्य हुआ। शायद बीबीसी से आ रहे होंगे। बोले, ‘‘जनसत्ता के प्रयोग पर किताब आ रही है। रवींद्र संपादित कर रहे हैं।’’ ‘मुझसे तो कहा नहीं’ । ‘मैं बोलूंगा। घर आना।’ करीब दो मिनट की इस बातचीत में उनका हाथ मेरे कंधे पर ही रहा और हर आने-जाने वाला उन्हें निहारता रहा। यह मेरी उनसे आखिरी मुलाकात थी। पत्नी उनके घर गईं क्योंकि उनके यहां कोई गमी हो गई थी। उसके बाद 6 नवंबर को मैंने उन्हें रात के डेढ़ बजे आईसीयू में ही देखा। उन्होंने अपनी चादर जतन से ओढ़ी थी, इसीलिए ज्यों की त्यों धर के चले गए थे। चेहरे पर एक कम्युनिकेटर का शांत भाव था। वह जिसने अपने समाज से जी भर संवाद किया। जो लगा वो लिखा और जो मन में आया कहते चले गए। सबकी खबर ली और सबको खबर दी। वे अपने को कबीर, नानक और गांधी की परंपरा का कम्युनिकेटर ही कहलाना पसंद करते थे। उसमें एक्टिविज्म भी था और रामकथा कहने की रामधुन भी थी।
रात में उतरे इस गहरे दुख के साथ एक आशंका भी सता रही थी। डर लग रहा था कि कहीं गुटबाजी में फंसा हमारा मीडिया और जातियों, इलाकों के खांचे में बंटा हिंदी समाज अपनी इतनी बड़ी क्षति पर उसके अनुकूल प्रतिक्रिया जता पाएगा। लेकिन सुबह होने के साथ ही जब सारे रास्ते गाजियाबाद की जनसत्ता सोसायटी की तरफ ही आने लगे तो लगा कि हमें अपने समाज पर उस तरह से दुखी होने की जरूरत नहीं है, जिस तरह प्रभाष जी कभी जैनेंद्र कुमार के निधन पर लोगों की बेरुखी से हुए थे। तब उन्होंने हिंदी समाज की बांग्ला और मराठी समाज वगैरह से तुलना करते हुए उसे कोसा भी था। लेकिन उस दिन दिल्ली में रहने वाला प्रिंट और चैनल पत्रकारिता का हर छोटा- बड़ा शख्स जैसे भी जब भी पहुंच पाया उनके अंतिम दर्शन को आ गया। (नाम गिनाने में किसी के छूट जाने का खतरा है जो कहीं बुरा लगे तो ठीक बात नहीं होगी।) इसमें वे भी थे जो हाल में ब्लागों पर प्रभाष जी को ब्राह्मणवादी बता कर उनकी आलोचना कर रहे थे और वे भी थे जो बहुत चाह कर जनसत्ताई नहीं बन पाए थे। प्रभाष जी ऐसे द्रोणाचार्य थे, जो हमेशा पांडवों की तरफ से लड़े। उनके अर्जुन और भीम जैसे शिष्य भले हों, पर उनके एकलव्यों की बहुत बड़ी संख्या है। जिनसे उन्होंने कभी अंगूठा नहीं मांगा। इसीलिए वे आज अर्जुन से बड़े धनुर्धर हैं। जाहिर है वे अपने पीछे हिन्दी का बहुत बड़ा परिवार छोड़ गए जो अपनी तमाम कमियों और संकीर्णताओं के बावजूद एक दूसरे के ज्यादा करीब है। उनकी पार्थिव देह पर फूल चढ़ाने वे राजनेता भी आए जिन पर वे कई दशकों से कांटे बरसा रहे थे। प्रभाष जोशी पर लगभग सभी चैनलों ने कुछ न कुछ दिखाया और हिंदी -अंग्रेजी सभी अखबारों ने किसी न किसी रूप में श्रद्धांजलि जरूर दी। यह उनके जीवंत संवाद का असर था। यह उस मीडिया का सरोकार भी था जिसे बाजारवादी बता कर प्रभाष जोशी लगातार कोसते रहते थे। जाहिर है हर तरह की व्यावसायिक अनिवार्यता और राजनीतिक दबावों के बावजूद आज का मीडिया न तो मानवीय सरोकारों की उपेक्षा कर सकता है, न ही किसी कम्युनिकेटर को बाइपास कर सकता है। मीडिया के इस कवरेज के अलावा जब यह खबरें आना शुरू हुईं कि उनकी स्मृति में देश के तमाम जिलों में शोकसभाएं हुईं तो लगा कि उन्होंने अपने समाज पर कितना असर डाला था।
मुझे ही नहीं, हमारी पीढ़ी और उसके बाद पत्रकारों को यह सवाल बार-बार परेशान करेगा कि आखिर प्रभाष जोशी में ऐसा क्या था जिसके चलते वे समाज पर इतनी गहरी छाप छोड़ सके? नेताओं, अफसरों, साहित्यकारों और लेखकों के खिलाफ कठोर लेखन करने के बावजूद वे उनसे सहज संवाद कैसे बनाए रख पाए? आखिर इतना साहस उन्हें कहां से मिलता था? क्या उन्हें यह साहस रामनाथ गोयनका जैसे मालिक से ही मिल सकता था? अगर ऐसा था तो उनके न रहने के बाद भी वे कैसे इतने दमदार तरीके से लिखते और बोलते रहे? प्रभाष जी तो अपनी पत्रकारीय सफलता का श्रेय कई बार रामनाथ जी के अलावा, ईश्वर और भाग्य को भी देते थे। हम लोगों को उनकी कठिन साधना का भी इसमें भारी योगदान लगता है। इसमें उस भाषा यानी हिंदी की भी ताकत का योगदान रहा जिसमें वे अपने को अभिव्यक्त कर रहे थे। अगर वे इंडियन एक्सप्रेस में ही रहते और अंग्रेजी के पत्रकार बने रहते तो शायद ही अपने समाज से ऐसा संवाद कर पाते। इसीलिए अज्ञेय से लेकर विजय देव नारायण साही और रामविलास शर्मा जैसे तमाम अंग्रेजी जानने वालों ने हिंदी को ही अपनी अभिव्यक्ति के लिए चुना। लेकिन उनके लेखन और व्यक्तित्व को निकटता से देखकर मुझे लगा कि उन्होंने युवावस्था में ही महात्मा ‘गांधी की वह ताबीज’ पहन ली थी जिसे गांधी ने कतार के आखिरी आदमी के हितों के लिए सभी को बांधने की सलाह दी थी। जब उन्हें कोई भ्रम होता या उन पर कोई संकट आता था तो वह ताबीज उनकी रक्षा करती थी। शायद इसीलिए उन्हें अपनी पत्रकारिता पर गर्व जरूर था लेकिन वह उनके कुछ शिष्यों की तरह कभी उनके सिर चढ़ कर नहीं बोली। उसी के चलते वे हिंदुत्ववादियों के विरोध का साहस जुटा पाए। लोग कहते रहे कि वे राज्यसभा में जाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। लेकिन उन्हें राज्यसभा की सदस्यता तो क्या पद्मश्री या पद्मभूषण जैसे पुरस्कार भी नहीं मिले। यह सब होता तो आरोप सही निकलते और संसार से विदा लेते समय उनकी चादर न तो उतनी दुग्ध धवल होती न ही उनके मुख पर वैसी कांति होती।

अरुण कुमार त्रिपाठी
एसोसिएट एडीटर, हिन्दुस्तान

तो कैसे बचेंगे तालाब

सर्वोच्च न्यायालय, केंद्र सरकार व प्रदेश सरकार के भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए वन, तालाब , पोखर, जलप्रणालियां आदि को उनके प्राकृतिक स्वरूप में लाने के आदेश प्रशासनिक भ्रष्टाचार व हीलाहवाली के चलते जमीन पर कारगर होते नहीं दिख रहे है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस मद में पैसा नहीं खर्च कर रही है। महात्मा गांधी राष्ट्रिय रोजगार गारंटी योजना में पहली प्राथमिकता भूजल को बचाए रखने की है साथ ही आदर्श जलाशय योजना से तालों के सौंदर्यकरण तक की योजनाएं तो चली और अरों रूपये खर्च भी हुए लेकिन तालों पर किये गये अवैध कजें आज भी इन योजनाओं का सीधा-सीधा मुंह चिढा रहे है। जिन तालों पर अरबों रूपयें बहाकर खुदाई के दावे किये जा रहे है, उनमें ज्यादातर वो ही तालाब शामिल है जो पहले से ही गांववालों के प्रयासों से ही जलमग्न थे।आगे